ॐ जय जय गुरु गोविन्द आरती तुम्हारी

ॐ जय जय गुरु गोविन्द आरती तुम्हारी.
निरखत पद कंज कमल कोटि पतित तारी..
कोटि भानु उदय जाके दीपक का वारी.
क्षीर है समुद्र जाकी चरण का पखारी..
ॐ जय जय गुरु गोविन्द आरती तुम्हारी…..

लाख चौरासी तीन लोक जाकी फुलवारी.
पुष्प लेके क्या चढाउँ भॅवर का जुठारी..
ॐ जय जय गुरु गोविन्द आरती तुम्हारी…..

बाल भोगे काहे दीजै द्वारे पदारथ चारी.
कुबेर जी भंडारी देवी जाकी पनिहारी..
ॐ जय जय गुरु गोविन्द आरती तुम्हारी…..

शून्य शिखर भॅवर जाकी तुरिया असवारी.
आठ पहर बाजा बाजे शब्द करे झनकारी..
ॐ जय जय गुरु गोविन्द आरती तुम्हारी…..

काम क्रोध लोभ-मोह सद्गुरु ने मारी.
आरती ने जान लियो तन-मन-सा वारी..
ॐ जय जय गुरु गोविन्द आरती तुम्हारी…..


ॐ जय सद्गुरु हरे

ॐ जय सद्गुरु हरे , स्वामी जय सद्गुरु हरे
जय सद्गुरु दयानिधि, दिनन हितकारी..
स्वामी भक्तन सुखकारी …
जय जय मोह विनाशक , जय जय तिमिर विनाशक ,
भव बंधनहारी ….
गोविन्द आरती तुम्हारी …
ॐ जय सद्गुरु हरे , स्वामी जय सद्गुरु हरे……..

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव गुरु मूरतधारी…
स्वामी गुरु मूरतधारी …
वेद पुराण बखानत , शास्त्र पुराण बखानत …
गुरु महिमा भारी…
ॐ जय सद्गुरु हरे , स्वामी जय सद्गुरु हरे……..

जप तप संयम दान बहुत दीन्हे,
स्वामी दान विविध दीन्हे ….
गुरु बिन ज्ञान न होई, दाता बिन ज्ञान न होई ,
कोटि जतन कीजै…
ॐ जय सद्गुरु हरे , स्वामी जय सद्गुरु हरे……..

माया मोह नदी जल जीव बहे सारे ,
स्वामी जीव बहे सारे ….
नाम जहाज बिठाकर, शब्द जहाज चढ़ाकर,
गुरु पल में तारे ….
ॐ जय सद्गुरु हरे , स्वामी जय सद्गुरु हरे……..

काम क्रोध मद मत्सर चोर बड़े भारी ,
स्वामी चोर बड़े भारी ….
ज्ञान खड्ग देकर में, शब्द खड्ग देकर में ,
गुरु सब संहारी …..
ॐ जय सद्गुरु हरे , स्वामी जय सद्गुरु हरे……..

नाना पंथ जगत में निज निज गन गावै,
स्वामी न्यारे न्यारे यश गावै….
सबका सार बताकर, सबका भेद लखाकर,
गुरु चरणामृत निर्मल सब पातकहर्ता ,
स्वामी सब दोषक हर्ता ………
वचन सुनत तम नाशै, शब्द सुनत भ्रम भागे ,
सब संशय तारी ,
गुरु महिमा भारी ,…
ॐ जय सद्गुरु हरे , स्वामी जय सद्गुरु हरे……..

तन मन धन सब अर्पण, गुरु चरणन कीजै,
प्रेमी गुरु अर्पण कीजै…
दीनन होई अचल पद ,दीनन होई परम पद,
मोक्षगति दीजै…
ॐ जय सद्गुरु हरे , स्वामी जय सद्गुरु हरे……..


श्लोक

ध्यानमूलं गुरुमूर्ति पूजामूलं गुरुपदम्,
मंत्रमूलं गुरुवाक्यम्, मोक्षमूलं गुरुकृपा….

गुरु समान तिहुँ लोक में और न दूजा कोई,
नाम जपत पातक नाशै, ध्यान धरत हरि होई…

श्रीगुरु चरन सरोज की महिमा अपरम्पार,
जाके सुमिरन से सदा हो भवसागर पार….

हो भवसागर पार सदा गुरु का यश गावे,
अावागमन नाशत बहुरि भवजलि नहीं आवे ….

कहे गुरु का दास, सुनो सबहि अलबेला,
बनो गुरु का भक्त, काल का कटे झमेला….

गुरु मूरति गुरु चन्द्रमा, तुलसीदास चकोर,
आठ पहर निरखत रहे, गुरु चरन की ओर….

तीरथ गये से एक फल, संत मिले फल चारि,
सद्गुरु मिले अनंत फल, कहे कबीर विचारि….

भाव भगति मोहे दीजिये, गुरु देवन के देव,
और कछु न चाहिए, निश-दिन चरन के सेव ….

त्वमेव माता च पिता त्वमेव,
त्वमेव बंधु च सखा त्वमेव ,
त्वमेव विद्या द्रविडं त्वमेव,
त्वमेव सर्वम् मम देव देव ….

कर्पूरगौरं करूणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम,
सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानी सहितं नमामि….
मंगलम भगवान विष्णु मंगलम गरुणध्वज ,
मंगलम पुण्डरीकाक्ष: सर्वमङ्गलाय तनोहरि: ….

जय गुरुवर जय सरकार …..

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Mahayogi Tapsi Sarkar