महायोगी तपसी सरकार


पूज्य गुरुजी

सरकार जी की महासमाधि के पश्चात् पूज्य गुरु जी उनकी आध्यात्मिक विरासत के उत्तराधिकारी बने। अब गुरु जी की वाणी ही सरकार जी की वाणी है। गुरूजी के पावन मार्गदर्शन एवं आशीर्वाद से सबका मंगल हो रहा है।

गुरूजी के घर में ही अलग एक छोटा-सा, शांत एवं सुन्दर कक्ष है। उसी में गुरूजी अपना लगभग सारा समय ध्यान एवं सत्संग में बिताते हैं। वे विशेष कार्यों के निमित्त ही वहाँ से बाहर निकलते हैं। उस शांत कक्ष में एक सुन्दर तस्वीर लगी है जिसमें सरकार जी के साथ रमण महर्षि एवं कनखल स्वामी जी का मनमोहक चित्र है। इसके अलावा अन्य कोई तस्वीर नहीं है। ये तीनों संत अपने समय में समकालीन थे और तीनों ही महायोगी थे। वे एक दूसरे से पूर्णतया परिचित थे।

एक समय होता था, जब गुरूजी उस कक्ष में रखे लकड़ी के एक तख्ते पर विश्राम करते थे। जब वे उस पर सोते थे तो उन्हें महसूस होता था कि तख्ते पर उनके पास में कोई बैठा है और कह रहा है कि मैं कहाँ सोऊं? ऐसा अनुभव उन्हें कई बार हुआ था। एक रात्रि को उन्होंने स्पष्ट देखा कि उनकी शैय्या पर सरकार जी बैठे थे और पूछ रहे थे, “मैं कहाँ सोऊं?”  ज्यों ही गुरूजी उठे, वे अदृश्य हो गए। उस दिन से गुरु जी नीचे ही अपनी शैय्या लगाने लगे। लकड़ी का वह तख्ता अब सरकार जी की पावन स्मृतियों में से एक है।

गुरु जी के व्यक्तित्व को जानना साधारण जनों की सामर्थ्य से बाहर है। वे अपने आपमें एक महान विभूति हैं जिनके बहुमूल्य मार्गदर्शन में चलकर लोग अपना जीवन सफल बना रहे हैं और अध्यात्म पथ पर तीव्रता से अग्रसर हो रहे हैं. उसी कक्ष में बैठकर वे लोगों का मार्गदर्शन करते हैं।

भक्तजन कहते हैं, “गुरु जी! जब आप बोलते हैं तो हमें बहुत शान्ति मिलती है, आपकी वाणी से अमृत छलकता है।”

तो फिर गुरु जी सरकार जी ओर संकेत करते हुए प्रतिक्रिया देते हैं, “देखो! वे जो हैं, सरकार जी, वे ही सब कुछ करते हैं।मैं क्या बोलूंगा? मुझमें इतना सामर्थ्य नहीं है।”

तरुवर, सरोवर, संतजन, चौथ बरसे मेह।
परमारथ के करने, चारों धरिया देह।।

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Mahayogi Tapsi Sarkar